मध्यमवर्ग... बोले तो मिडिलक्लास... मिला क्या इन्हें..?

*मध्यमवर्ग* (विबा)


चीन ने #कोरोनावायरस बनाया और पूरी दुनिया में फैल गय।
 महामारी फैली और सभी इसकी चपेट में आ गए।


 कई मुल्क तबाह हो गए लाखों लोग मर चुके।


 हिंदुस्तान में भी अस्सी हजार से ज्यादा लोग कोरोना की चपेट में है और ढाई हजार से अधिक मर चुके हैं।


सरकार परेशान है घर बैठकर लोगों को कैसे खिलाएं, एक सीमित बजट होता है आमदनी के श्रोत बंद है।


ऐसे में खर्च का इंतज़ाम कैसे हो। बड़ी परेशानी


फिर भी सरकार ने 20 लाख करोड़ का #पैकेज दे दिया।
गरीब मजदूर, किसान, बड़े उद्योग, लघु उद्योग आदि को


सरकार 80 करोड लोगों को मुफ्त या मुफ्त जैसी कीमत पर राशन देने का काम भी कर रही है।
कहीं मोदी किट तो कही भोजन दे रही है।
कहीं सिलिंडर दे रही। कहीं निशुल्क ट्रेन तो कहीं अन्य सहायता दे रही।
कोरोना टेस्ट में 4000 दे रही है। रेपिड जांच किट में 500 दे रही है। क्वारन्टीन किये प्रति व्यक्ति के लिए 160  रुपये/दिन दे रही है।
हॉस्पिटल में क्वॉरेंटाइन के लिए 2500 रुपये प्रति व्यक्ति दे रही है और हॉस्पिटल में कोरोना वायरस के मरीज के लिए ₹25000 प्रति व्यक्ति रोजाना दे रही है।


सरकार ने कुछ लोगों के खाते में ₹2000 डाले हैं कुछ लोगों के खाते में ₹1000 तो कुछ के खातों में ₹500 भी डाले हैं। इनमें कोई किसान है कोई श्रमिक है कोई विधवा महिला है कोई बुजुर्ग व्यक्ति है कोई दिव्यांग है किसी का जनधन खाता है।


यह पैसे वापस नहीं करने एक तरह से यह लोगों को खर्च करने के लिए दिए गए हैं और सरकार देती भी है।
बिना कुछ करे यह पैसा लोगों  के बैंक खातों तक पहुंचता है।


देश की आबादी एक अरब  33 करोड़ के लगभग है।
लोग मजदूरों के लिए परेशान है श्रमिकों के लिए परेशान है किसान की बात कर रहे है हालांकि गांव देहात में लोगों का कोई फर्क नहीं पड़ा है खेती के तमाम कार्य जारी है फसलें कम ज्यादा में बेची जा रही हैं, भुगतान भी देर सवेर हो जाता है। और सबसे बड़ी बात किसान के पास उसकी पुश्तैनी जमीन है जो कोई हड़प नहीं सकता कोई उसे जमीन से बेदखल नहीं कर सकता।


 इस देश में अगर हम बात करें 5 से 10 करोड़ लोग करोड़पति/अरबपति बड़े टाइकून भी है।
जिन्हें कोरोनावायरस  के चलते बहुत अधिक परेशानी अभी तक नहीं झेलनी पड़ी है और अगर समस्या आएंगी भी तो उन्हें ये झेल लेंगे।


 इनके बाद भी इस मुल्क के अंदर 35 करोड लोग ऐसे भी हैं जिनकी कोई चर्चा नहीं, जिनके लिए कहीं कोई बजट नहीं। कोई मदद नही और
 जिनकी कोई डिमांड नहीं।


 *ऐसे लोग #मध्यमवर्गीय हैं। बोले तो *मिडिल क्लास*


ना ही सरकार से कुछ मांग रहे हैं जबकि कोरोना वायरस के कहर में अपना बहुत कुछ खो चुके हैं। *कोई  टीचर है किसी की अपनी दुकान है कोई प्रेस का काम करता है। किसी कि लॉन्ड्री है, किसी की कन्फेक्शनरी है किसी की चश्मे की दुकान है। किसी की जूते की दुकान है किसी की मोबाइल की दुकान है। किसी का कोई अन्य व्यवसाय है कोई हलवाई है। कोई फोटोग्राफर, कोई कम्प्यूटर ऑपरेटर। कोई पत्रकार है। कोई वीडियोग्राफर है। कोई डेली पैसिंजर है, लोगो का सामान लाकर देता है। कोई पिज़्ज़ा डिलीवरी बॉय है। कोई सेल्समेन, कोई मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव, कोई एकाउंटेंट, कोई फोरमैन, कोई सेल्स रिप्रिजेंटेटिव है।  कोई अधिवक्ता है कोई किसी मोहल्ले में छोटा सा क्लिनिक चला रहा है। कोई किसी फेक्ट्री, उद्योग, सिक्युरिटी का दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी है। किसी ने वेन बना रखी। कोई ड्राइवर है।*
किसी ने बैंकेट हाल बना रखा है किसी ने रेस्टोरेंट चला रखा है किसी का ढाबा है मतलब कोई छोटी मोटी पंद्रह ₹20000 की नौकरी कर रहा है या फिर किसी ने अपना छोटा-मोटा व्यवसाय कर रखा है। किसी को कारोबार की जगह का किराया देना है। किसी ने कर्ज़ ले रखा है।
 यह लोग बैंक में सिबिल ठीक बनी रहे इसलिए जो भी कर्ज आदि लेते हैं उसी टाइम पर जमा करते हैं।
यह कुछ पैसा मेडिकल इंश्योरेंस में भी जमा करते हैं। डाकखाने में भी जमा कर लेते हैं।
कुछ एलआईसी पॉलिसी ले लेते हैं कुछ अन्य सामान भी बैंक के माध्यम से क्रेडिट कार्ड पर उधार ले लेते हैं।
इस तरह इनकी गुजर बसर होती रहती है इनका सब कुछ  कायदे का होता है, अनुशासन वाला 
 इनकी जिंदगी किसी तरह चलती रहती है यह सम्मान के साथ यूं कहिए झूठे सम्मान के साथ जिंदगी जीते हैं।


इनके 2 महीने से नौकरी रोजगार उद्योग उद्यम छोटे-मोटे काम सब बंद है। हलवाई का सामान दुकान में ही सड़ चुका है कई की दुकानों में फफूंदी लग चुकी है। दुकान में रखा सामान लाखों का नुकसान हो जाएगा जब भी दुकान खुलेंगी ये उन्हें मालूम है।


परन्तु कोई इनकी आवाज उठाने वाला नही है।
सोचिए कभी इनके बारे में भी सोचिए।
 जो इनकम टैक्स देने का काम भी करते हैं जो बिजली का बिल भी समय पर देते हैं। जो हाउस टैक्स वाटर टैक्स समय पर जमा करते हैं जो कर्ज की तमाम किस्तें समय पर जमा करते हैं।
जिनके लिए एक दिन का व्यवसाय बन्द रखने, एक दिन शिक्षण कार्य ना करने, 1 दिन ड्यूटी पर ना जाने से बड़ा फर्क पड़ता है।
ऐसे लोग जिनके लिए सरकार के पास कुछ नहीं है जिनके लिए अखबार के पास कुछ नहीं है
जिनके लिए मीडिया के पास कुछ नहीं है।
वह 2 महीने से अपने जीवन को कैसे गुजार रहे होंगे..?


 किसी का घर कैसे चलता है..
 किसी का पढा कर चलता है किसी का घर दुकान खोलने से चलता है और यह सब घर बैठे हैं।
परंतु यह रो नहीं रहे।
सर पर हिंदुस्तान नहीं उठा रखा।
यह लोग लोकडाउन का पालन भी कर रहे हैं घर में भी बैठे हैं डरे हुए भी है।


इनकी निगाहें भी टीवी पर है परंतु इनके लिए कहीं कुछ भी नहीं है, कुछ भी।
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और हां यही वर्ग है जो सड़क पर उतरकर लोगों को खाना खिलाता भी नजर आ रहा है।
जो अपनी छोटी मोटी बचत को प्रधानमंत्री केयर फंड में तो कहीं जिलाधिकारी को तो कहीं मुख्यमंत्री को तो कहीं किसी एनजीओ को देकर देश हित में अपनी भूमिका से न्याय कर रहा है।
 यही वह व्यक्ति है जो घर में मास्क सील कर लोगों को बांट रहा है।
यही वह व्यक्ति है जो मशीन लाकर गली मोहल्लों को सैनिटाइज भी कर रहा है।


इसके पास जो कुछ है वह सब कुछ देश हित में न्योछावर करने के लिए लगा पड़ा है....
 बिना देश से शिकायत किए कि मेरे हिस्से में क्या आया...


 मेरे लिए देश के पास क्या है...


नहीं यह बिल्कुल भी शिकायत नहीं कर रहा....😢😢😢


मगर तुम तो सोच लेते....!!!!