देश के गन्ना किसानों की सुप्रीम कोर्ट ने लिया बड़ा निर्णय
5 जजों की बेंच ने दिया फैंसला, राज्य सरकार के गन्ना मूल्य निर्धारण करने के अधिकार मामले को बताया सही
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वी एम सिंह सुनवाई पर रहे
आज उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब आदि राज्यो के गन्ना किसान के लिए सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों की बेंच ने पिछले फैसले को बरकरार रखते हुए बड़ी राहत प्रदान की।
बताते चले कि चीनी मिल मालिकों (वेस्ट चीनी मिल एसोशिएशन) द्वारा दायर एक रिट 2005 को उच्चतम न्यायालय में डाली थी, जिस पर आज पूर्व के आदेश पर मोहर लगा उसे 7 सदस्य संविधान पीठ में नही भेजने की बात कही।
बताते चले इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार प्रदेश में गन्ना मूल्य निर्धारण के अधिकार को खो चुकी थी।
हाईकोर्ट में मिल मालिकों द्वारा दायर याचिका में अपील करते हुए राज्य सरकार के गन्ना मूल्य निर्धारण के अधिकार को चुनौती दी थी। इस पर जब सरकार से उनका पक्ष पूछा गया था तो सरकार की और से सॉलिसिटर ने अजीब जवाब देते हुए कहा था कि प्रदेश सरकार इसलिए गन्ने का भाव यहां बढ़ाते हैं क्योंकि पिछली सरकारे बढ़ाती आई है। जिसके बाद अदालत ने आदेश दिया था कि राज्य सरकार का रेट बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है और केंद्र का ही रेट लागू होगा।
इस आदेश के बाद 2002-03, 2003-04, 2004-05 के बीच गन्ना किसानों को राज्य सरकार द्वारा गन्ना मूल्य बढ़ा देने के बाद भी केंद्र सरकार द्वारा उस समय तय किया गया ₹95 कुंतल गन्ने का भाव ही मिला था।
जिसके बाद सरदार वीएम सिंह ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और वहां कहा कि उत्तर प्रदेश में प्रति बीघा गन्ना कम पैदा होता है और यहां के गन्ने की रिकवरी भी कम है।
जबकि अन्य जगह (महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, आंध्रप्रदेश आदि ) किसानों को एडवांस गन्ना बोने के लिए पैसा दिया जाता है, वहां रिकवरी भी ज्यादा हैं और वहां गन्ना प्रति बीघा 80 कुंतल से अधिक खेतों में निकलता है और किसान को बोनस भी मिलता है।
इसलिए उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में प्रदेश सरकार यहां के किसानों को प्रतिस्पर्धा के युग मे बराबर रख सके इसलिए राज्य सरकारें, 'राज्य परामर्शी मूल्य' (स्टेट एडवाइजरी प्राइस, एसएपी)जारी करती है। और सरकार को गन्ना मूल्य बढ़ाने का हक है।
जिसके बाद अदालत ने राज्य सरकार को रेट बढ़ाने का अधिकार दिया और 2002-03 से 2004-05 के बीच में 3 बरस का रुक हुआ गन्ना किसानों को बढ़ा हुआ भुगतान एक साथ मिला।
यह मामला बाद में 2005 में चीनी मिल द्वारा चुनौती दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पांच बेंच की अदालत में पहुंचा जहां आज अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि प्रदेश सरकार को पूरा हक है कि वे रेट बढ़ाए।
अगर आज इस पर राज्य सरकार द्वारा रेट तय करने के पक्ष में फैंसला ना आता तो यह किसानों के लिए दुखद होता। उन्हें केंद्र सरकार द्वारा जारी एफआरपी (उच्च एवं लाभकारी मूल्य) ₹275 प्रति कुंतल के हिसाब से ही भुगतान मिलता हालांकि ₹275 के भाव गन्ने की 10 फीसदी रिकवरी (1 कुंटल गन्ने से कम से कम 10 किलो चीनी बनने के आधार) पर मिलता है।
अगर उत्तर प्रदेश में चीनी मील 12 की रिकवरी बताती तो किसानों को उस स्थिति में भी 330 रुपये प्रति कुंटल का भाव मिलता। अगर रिकवरी कम दिखाई जाती तो फिर भाव 300 रुपये प्रति कुंटल के आस पास मिलता। खैर ये किसान हित में बड़ी जीत है।